सरकारी अस्पताल – हालत देखके दिल बैठ जाए
अब देखो, देश की 70% आबादी गांव में रहती है, लेकिन हर 10,000 में सिर्फ 0.6 MBBS डॉक्टर? वाह भई वाह! हालत ये है कि गाँववालों को सिर दर्द से लेकर बुखार तक के लिए 30-50 किलोमीटर तक भटकना पड़ता है. मिल जाए तो किस्मत, वरना भगवान भरोसे।
कौन-कौन सी आफ़तें हैं?
- डॉक्टर ढूंढो तो ढूंढते रह जाओ (AIIMS में भी 30% सीटें खाली पड़ी हैं)
- दवाएँ और मशीनें, जैसे सरकारी अस्पताल में रखना कोई गुनाह हो
- वेंटिलेटर और ICU बेड – गिनती के, जैसे कोई लॉटरी लगी हो
- लाइनें ऐसी, मानो मुफ़्त में सोना बँट रहा हो
- ऊपर से दलाली, रिश्वतखोरी, धंधा ही समझो
“सर्जरी की डेट छह महीने बाद मिली। तब तक पेशेंट रहेगा या नहीं, पता नहीं।”
– नर्स, पटना मेडिकल कॉलेज
प्राइवेट अस्पताल – इलाज या लूट?
अब प्राइवेट अस्पतालों की बात करें तो, यहाँ इलाज कम, जेब कटती ज़्यादा है. मिडिल क्लास भी यहाँ आकर सोचता है – इलाज करवाएँ या घर बेच दें?
खर्चा देखो:
बीमारी प्राइवेट खर्च सरकारी खर्च (थ्योरी में)
डेंगू (5 दिन) ₹85,000–1.2 लाख ₹0–₹5000
हार्ट बायपास ₹3.5–6 लाख ₹40,000–₹70,000
डिलीवरी ₹45,000–₹1.2 लाख ₹500–₹10,000
“बीमा है, पर पहले 1 लाख जमा कराओ – तब बात करेंगे।”
– रीता देवी, दिल्ली
आयुष्मान भारत का क्या हाल?
PM-JAY (आयुष्मान भारत) ने शुरुआत में लोगों को राहत दी, पर 2025 तक सरकार का बजट कट चुका है. कई राज्यों में ये बस कागजों पर ही चलता है. प्राइवेट अस्पताल गरीब मरीजों को आयुष्मान कार्ड देखकर मुंह फेर लेते हैं. 5 लाख की बीमा राशि? कई बीमारियों में तो चुटकियों में उड़ जाती है. प्रचार खूब, निगरानी मामूली.
हेल्थ बजट और नीति – कब सुधरेगा?
WHO कहता है, कम से कम 6% GDP स्वास्थ्य पर खर्च करो. इंडिया क्या करता है? बस 2.1% – बाकी पैसा कहाँ जाता है, भगवान जाने.
“अब हेल्थ सर्विस अधिकार नहीं, किस्मत की बात हो गई है।”
– डॉ. आर. शर्मा
अच्छे मॉडल भी हैं, बस देखने की ज़रूरत
- केरल में फैमिली हेल्थ सेंटर – टॉप क्लास
- दिल्ली का मोहल्ला क्लिनिक – WHO भी तारीफ कर गया
- राजस्थान में फ्री दवा-जाँच – गाँव वालों की बल्ले-बल्ले
लास्ट में सच क्या है?
भाई, इलाज अमीरों का प्रिविलेज नहीं, सबका हक है. सरकारी अस्पतालों को दुरुस्त करो, डॉक्टर गाँव भेजो, मशीनें दो – वरना आने वाले टाइम में इलाज भी VIP पास वालों के लिए ही रह जाएगा.




