मध्य प्रदेश। किसानों और पशुपालकों को डेयरी व्यवसाय से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के जमीनी क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। नेशनल पिलर के मैदानी सर्वे में पशुपालकों से बातचीत के दौरान ऐसे आरोप सामने आए हैं कि कुछ मामलों में पशु स्थानीय स्तर से खरीदे जा रहे हैं, जबकि योजना की शर्तों के अनुरूप खरीद दिखाने के लिए बाहर के पशु विक्रेताओं के बिल लगाए जा रहे हैं।
सर्वे में यह शिकायत भी सामने आई कि कुछ पशु वास्तविक खरीद मूल्य से काफी कम कीमत में उपलब्ध होने के बावजूद योजना के अनुरूप अधिक राशि के बिल तैयार किए जा रहे हैं। कुछ मामलों में पशुओं के बिना टैग खरीदने की बात भी सामने आई है।
पशु की कीमत और बिल में अंतर का सवाल
मैदानी बातचीत में एक पशु विक्रेता से जुड़ी ऐसी जानकारी सामने आई, जिसमें वास्तविक लेन-देन की रकम और योजना के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले बिल की राशि में बड़ा अंतर होने की बात कही गई।
यदि यह स्थिति दस्तावेजों से सत्यापित होती है, तो सवाल सिर्फ किसान और विक्रेता तक सीमित नहीं रहेगा।
यह सवाल उठेगा कि—
पशु की वास्तविक खरीद कीमत और बिल की राशि में इतना अंतर कैसे स्वीकार किया गया?
और उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि खरीदे गए पशु का वास्तविक सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
बाहर से पशु खरीदने की शर्त, स्थानीय बाजार में खरीद का आरोप
मैदानी सर्वे में कुछ लाभार्थियों से बातचीत के दौरान यह आरोप सामने आया कि योजना के लिए पशु बाहर से खरीदना आवश्यक बताया जाता है, लेकिन वास्तविक खरीद स्थानीय स्तर से की जा रही है और दस्तावेजों में दूसरे स्थान के पशु विक्रेता से खरीद दर्शाए जाने की बात कही जा रही है।
यदि ऐसा हो रहा है तो योजना के उद्देश्य और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गंभीर अंतर की आशंका पैदा होती है।
सरकार की योजना का ऑनलाइन पोर्टल आवेदन, भूमि विवरण और बैंक प्रक्रिया को ऑनलाइन माध्यम से संचालित करने की जानकारी देता है।
ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि ऑनलाइन रिकॉर्ड में दर्ज पशु और किसान के पास वास्तव में मौजूद पशु का मिलान किस तरह किया जाता है?
बिना टैग पशु खरीदने का आरोप
मैदानी सर्वे में कुछ पशुओं के बिना टैग खरीदे जाने की शिकायत भी सामने आई है।
यह बिंदु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पशु की पहचान, रिकॉर्डिंग और निगरानी के लिए टैगिंग व्यवस्था का उपयोग किया जाता है। मध्य प्रदेश सरकार की पशुपालन संबंधी योजना जानकारी में पशु खरीद से जुड़ी एक अन्य योजना के लिए स्पष्ट रूप से कहा गया है कि खरीदे गए पशुओं में टैग लगा होना अनिवार्य है।
इसलिए कामधेनु योजना के मामले में भी यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि प्रत्येक लाभार्थी के खरीदे गए पशु की पहचान, टैग, खरीद स्थान, विक्रेता और बिल का आपस में मिलान किस स्तर पर किया जाता है।
विभाग की निगरानी पर सबसे बड़ा सवाल
यदि किसान वास्तव में स्थानीय बाजार से पशु खरीद रहा है, बिल किसी दूसरे स्थान के विक्रेता का लगाया जा रहा है और पशु की पहचान का टैग भी खरीद के समय उपलब्ध नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सत्यापन प्रक्रिया में इन विसंगतियों की जांच कौन करता है?
क्या विभागीय अधिकारी पशु को मौके पर देखकर उसका टैग नंबर दर्ज करते हैं?
क्या टैग नंबर को खरीद बिल से जोड़ा जाता है?
क्या विक्रेता से भुगतान का प्रमाण लिया जाता है?
क्या बैंक से जारी राशि और वास्तविक पशु खरीद भुगतान का मिलान होता है?
क्या अधिकारी पशु की नस्ल, उम्र, दूध उत्पादन और वास्तविक बाजार कीमत का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हैं?
इन सवालों के जवाब योजना की पारदर्शिता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इन सवालों का जवाब जरूरी
- योजना के तहत खरीदे गए प्रत्येक पशु का टैग नंबर किस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है?
- क्या टैग नंबर और खरीद बिल का अनिवार्य मिलान किया जाता है?
- क्या पशु खरीद के समय किसान के साथ अधिकारी या अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद रहता है?
- वास्तविक भुगतान और बिल की राशि का सत्यापन कैसे होता है?
- यदि पशु स्थानीय बाजार से खरीदा गया हो और दस्तावेज में दूसरे स्थान की खरीद दिखाई जाए तो उसकी जांच की व्यवस्था क्या है?
- बिना टैग वाले पशु को योजना के तहत स्वीकार करने की अनुमति है या नहीं?
- पशु विक्रेता के बिल की वास्तविकता की जांच कौन करता है?
- क्या विभाग ने लाभार्थियों की पशु खरीद का कोई भौतिक ऑडिट कराया है?
आरोपों की जांच जरूरी
यह मामला किसी एक किसान या पशु विक्रेता को दोषी ठहराने का नहीं है। यदि आरोप सही हैं तो यह योजना की निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमजोरी का मामला हो सकता है; और यदि आरोप गलत हैं तो विभाग के पास दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर है।
इसलिए सबसे जरूरी है कि खरीद बिल, बैंक भुगतान, पशु टैग नंबर, पशु की तस्वीर, खरीद स्थान और लाभार्थी के रिकॉर्ड का स्वतंत्र मिलान कराया जाए।
यही प्रक्रिया यह साफ कर सकती है कि योजना के तहत वास्तव में वही पशु खरीदे गए हैं जिनकी खरीद कागजों में दिखाई गई है या नहीं।
सवाल सिर्फ योजना का नहीं, निगरानी का है
डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना का उद्देश्य किसानों और पशुपालकों को डेयरी व्यवसाय के माध्यम से आर्थिक रूप से मजबूत करना है। लेकिन किसी भी सरकारी सहायता योजना की विश्वसनीयता उसके कागजी प्रावधानों से नहीं, बल्कि जमीन पर पारदर्शी क्रियान्वयन से तय होती है।
अगर पशु वास्तव में खरीदे गए हैं, तो उनकी वास्तविक कीमत, वास्तविक विक्रेता, वास्तविक खरीद स्थान और टैग की जानकारी रिकॉर्ड में साफ होनी चाहिए।
और अगर इन चारों में अंतर मिलता है, तो विभाग को जवाब देना होगा।


