महंगाई, बेरोज़गारी और गांव की बर्बादी – आम आदमी की कमर टूट गई है भाई
दिल्ली की मंडी में 2025 की गर्मी? टमाटर ₹100 किलो, प्याज़ ₹60, दालें ₹140 से ऊपर। ये अब कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं रही – हिंदुस्तान में खाने-पीने की चीज़ों के दाम बस चढ़ने के लिए ही बने हैं शायद।
अब वजहें पूछेंगे? देखिए:
– मौसम का दिमाग खराब, फसल कब आएगी कब जाएगी कोई भरोसा नहीं
– डीज़ल महंगा, ट्रक वाले किराया दोहरा मांग रहे
– ऊपर से जमाखोरी, वितरण की ऐसी-तैसी
NSO की नई रिपोर्ट देखी? मिडिल क्लास का करीब 47% पैसा खाने पर ही उड़ जाता है, 2018 में ये 36% था। मतलब अब सब्ज़ी खरीदने से पहले लोग रेट सुनते हैं।
“अब तो सब्ज़ियाँ देख कर नहीं, दाम सुन कर खरीदते हैं”
– सुधीर कुमार, स्कूल टीचर, झारखंड
बेरोज़गारी – डिग्री है, नौकरी नहीं
2025 में सबसे बड़ा सिरदर्द ये नहीं कि नौकरी है या नहीं, सवाल ये है कि ढंग की नौकरी है या नहीं।
शहर के 20 से 30 साल के लड़कों-लड़कियों की बेरोज़गारी 12.6%, गांव में 9.3%, और महिलाओं के लिए तो सीधा 16.2%!
सरकार की PM Rozgar Yojna, Startup India – कागज़ों पर ही चमकती हैं, असल में ज़्यादा असर नहीं दिख रहा।
एकदम ताज़ा केस – राहुल यादव, बीएससी पास, तीन साल से एक्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं। खुद कहते हैं –
“सरकारी नौकरी तो सपना है, प्राइवेट में भी 8 हज़ार से ज़्यादा नहीं मिलता।”
जानकार लोग कहते हैं – हर साल 1 करोड़ नई नौकरियों की ज़रूरत है, मिलती हैं सिर्फ 30-35 लाख। स्किल डेवलपमेंट की बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, असल में हवा हवाई हैं।
किसान और गांव की आफत – अन्नदाता या कर्ज़ में डूबा हुआ?
पंजाब से बिहार, किसान अब मेहनत नहीं, जंग लड़ रहा है।
2024 में किसान आत्महत्या – 11,290 केस, जिनमें 73% छोटे किसान, यानी जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन है।
MSP? हर साल सरकार बोलती है, लेकिन मंडी में किसान को सही दाम मिल जाए तो किस्मत समझिए।
क्यों हालत खराब?
– बीज-खाद-डीजल सब महंगा
– सिंचाई का जुगाड़ मुश्किल
– मंडी में दलालों का राज
– ऊपर से कर्ज़ की तलवार
2025 की खरीफ फसल रिपोर्ट तो और डरावनी – यूपी, एमपी, झारखंड में औसतन 22% फसल चौपट, बीमा कंपनियों ने सिर्फ 6% दावे पास किए।
“साल में एक बार पैसा आता है, मंडी पहुँचते-पहुँचते आधा उड़ जाता है”
– रामलखन यादव, किसान, बलिया (उ.प्र.)
आखिर में क्या?
महंगाई, बेरोज़गारी और खेती की परेशानी – ये तीनों एक ही जड़ से जुड़े हैं। किसान बेहाल, तो शहर में खर्चा भी घटेगा। युवा बेरोज़गार, तो बाजार में मांग कम। फिर? अर्थव्यवस्था की गाड़ी रेंगती है।
असल सुधार तब होगा जब फैंसी स्कीम्स किताबों से निकलकर गाँव-गली तक पहुँचें, और पॉलिसी बनाते वक्त आम आदमी की भी सुनी जाए – वरना बस हर साल यही रोना।



