स्कूल की हालत देखो तो हँसी भी आए, गुस्सा भी। दरभंगा के बहेड़ा गांव में सरकारी स्कूल मतलब – एक कमरे में सारे बच्चे, ऊपर से छत से टपकता पानी! बारिश हो गई तो समझो क्लास फिसड्डी, किताबें भीगीं तो पढ़ाई गई भाड़ में।
सिर्फ बिहार ही नहीं, यूपी-झारखंड भी कुछ खास पीछे नहीं हैं। नेशनल पिलर की टीम जब कैमूर, गढ़वा, बांदा घूम आई, तो असली सीन देखकर सबका मूड खराब हो गया।
अब सोचो, बांदा के स्कूल में बस एक टीचर – पाँच क्लासें, एक ही आदमी, और ऊपर से ना टॉयलेट, ना बिजली, पानी भी जैसे-तैसे। बच्चों के मां-बाप को बस यही डर – कहीं स्कूल ठप न हो जाए, वरना बच्चे घर बैठे-बैठे सब भूल जाएंगे।
सरकार का क्या – स्कीमों की लिस्ट लंबी है, समग्र शिक्षा योजना, स्कूल रीबिल्डिंग… कागजों पर सब सुपरहिट! असल में? बजट तो फंसा पड़ा है, काम शुरू ही नहीं हुआ।
कोरोना के बाद से पढ़ाई मोबाइल पर – लेकिन गांवों में नेटवर्क ढूंढते-ढूंढते बच्चे थक जाएं। बिजली तो सपने जैसी, स्मार्टफोन तो दूर की बात है।
फिर भी उम्मीद बाकी है। ‘शिक्षा साथी’, ‘ग्रामीण ज्ञान केंद्र’ जैसे लोग कम्युनिटी सेंटर चला रहे हैं, बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बस, ये कोशिशें छोटी-छोटी हैं – जैसे समंदर में एक बूँद।
सच कहूं तो, दिल्ली-मुंबई की चमक इन गांवों तक पहुंची नहीं। यहाँ बच्चों की पढ़ाई असली जंग है। अगर सरकार अब भी सोती रही, तो बच्चे स्कूल की बातें सिर्फ कहानियों में सुनेंगे। चलो, उम्मीद करें – कुछ बदले!



