By satyendra kumar Editor
भारत में किसी सरकार के प्रति जनता का विश्वास केवल चुनावी परिणामों से नहीं बनता और न ही किसी एक आंदोलन से टूटता है। लोकतंत्र में विश्वास एक निरंतर प्रक्रिया है। सरकार अपने काम से उसे अर्जित करती है, जनता अपने अनुभव से उसे परखती है और समय-समय पर अपने मत से उसका निर्णय करती है।
नरेंद्र मोदी सरकार के बारह वर्ष पूरे होने के बाद आज भारत के सामने यही प्रश्न अधिक गंभीरता से उपस्थित है कि इस लंबे राजनीतिक दौर में जनता का सरकार के प्रति भरोसा किस आधार पर बना है और किन प्रश्नों ने उस भरोसे को चुनौती दी है। इसका उत्तर किसी एक पक्ष में नहीं है।पिछले बारह वर्षों में देश ने कई ऐसे परिवर्तन देखे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना कठिन है। बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ है। डिजिटल तकनीक ने शासन और नागरिक सेवाओं के बीच दूरी कम की है। बैंकिंग और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की व्यवस्था ने करोड़ों लोगों को औपचारिक आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा है। आवास, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और ऊर्जा जैसी आवश्यकताओं से जुड़ी योजनाओं का विस्तार हुआ है।रेलवे, राजमार्ग, हवाई अड्डे, डिजिटल भुगतान और सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण ने देश के विकास की गति और उसकी प्रशासनिक संरचना दोनों को प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सक्रियता भी बढ़ी है। इन परिवर्तनों ने सरकार के पक्ष में एक ऐसा राजनीतिक विश्वास तैयार किया है जिसे केवल प्रचार कहकर खारिज करना वास्तविकता को स्वीकार न करना होगा।लेकिन लोकतंत्र की प्रकृति ही ऐसी है कि उपलब्धियां प्रश्नों को समाप्त नहीं करतीं। कई बार वे प्रश्नों का स्वरूप बदल देती हैं। जब सड़क बन जाती है तो अगला प्रश्न रोजगार का होता है। जब डिजिटल सुविधा उपलब्ध हो जाती है तो अगला प्रश्न उसकी पहुंच और विश्वसनीयता का होता है। जब किसी गरीब परिवार को सरकारी सहायता मिलती है तो उसकी अगली चिंता बच्चों की शिक्षा और परिवार की स्थायी आय होती है।
यही वह बिंदु है जहां सरकार की उपलब्धियां जनता की नई अपेक्षाओं से मिलती हैं।आज देश में युवाओं के आंदोलनों को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखना आसान है, लेकिन उसके भीतर छिपी बेचैनी को समझना अधिक आवश्यक है। प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और रोजगार को लेकर युवाओं की चिंता किसी दल की बनाई हुई समस्या नहीं है। यह उस पीढ़ी की चिंता है जिसके पास शिक्षा पहले से अधिक है, सूचना पहले से अधिक है और अपने भविष्य के प्रति अपेक्षा भी पहले से अधिक है।युवा केवल नौकरी नहीं मांगता। वह अपने परिश्रम के लिए एक विश्वसनीय व्यवस्था चाहता है।इसी प्रकार श्रमिकों, किसानों और दूसरे सामाजिक समूहों के आंदोलनों को भी केवल सत्ता और विपक्ष के संघर्ष की दृष्टि से देखना अधूरा होगा। हर आंदोलन अपने साथ कुछ वास्तविक प्रश्न लेकर आता है। यह अलग बात है कि राजनीतिक दल उन प्रश्नों को अपने हित में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन राजनीतिक इस्तेमाल से किसी सामाजिक प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता।यहीं सरकार के सामने लोकतांत्रिक परिपक्वता की परीक्षा होती है।एक मजबूत सरकार वह नहीं होती जिसे कोई चुनौती न दे सके। मजबूत सरकार वह होती है जो चुनौती के बीच भी अपनी नीतियों को तथ्यों और जनहित की कसौटी पर परख सके।
भारत में सरकार के प्रति विश्वास का एक पक्ष यह भी है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में लंबे समय तक स्थिर सरकार रही है। स्थिरता अपने आप में लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इससे नीतियों को निरंतरता मिलती है और बड़े निर्णयों को लागू करने के लिए समय मिलता है।लेकिन स्थिरता के साथ जवाबदेही भी आवश्यक है।बारह वर्ष किसी भी सरकार के लिए इतना लंबा समय है कि जनता अब केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, उनके परिणाम भी देखना चाहती है। वह यह जानना चाहती है कि उसके जीवन में क्या बदला। उसके बच्चे के लिए अवसर कितने बढ़े। उसकी आय कितनी सुरक्षित हुई। इलाज कितना सुलभ हुआ। शिक्षा कितनी बेहतर हुई। और सरकारी व्यवस्था के सामने उसकी आवाज कितनी सुनी गई।यहीं से जनता के भरोसे का दूसरा अर्थ सामने आता है।जनता का विश्वास सरकार के प्रति अंध समर्थन नहीं है। लोकतंत्र में विश्वास का अर्थ यह भी है कि नागरिक सरकार से सवाल पूछने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखता है।जो नागरिक सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा करता है और उसी सरकार से किसी नीति पर सवाल भी करता है, वह विरोधाभासी नहीं है। यही लोकतंत्र है।इसी तरह किसी आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति को सरकार का विरोधी मान लेना भी सही नहीं होगा। कई बार आंदोलन व्यवस्था को कमजोर करने के लिए नहीं, उसे अपनी जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए होते हैं।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में सरकार से हर वर्ग की अपेक्षा समान नहीं हो सकती। किसान की प्राथमिकता अलग है, युवा की अलग, मध्यम वर्ग की अलग और गरीब परिवार की अलग। किसी नीति से एक वर्ग लाभान्वित हो सकता है और दूसरा उसके प्रभाव को लेकर चिंतित हो सकता है। इसलिए जनता के विश्वास को किसी एक आंकड़े में बांधना कठिन है।आज की वास्तविक तस्वीर शायद यही है कि सरकार के पास उपलब्धियों का मजबूत राजनीतिक आधार है, लेकिन उसके सामने अपेक्षाओं का स्तर भी पहले से ऊंचा है।जनता ने जिन सपनों के साथ सरकार को अवसर दिया था, उनमें से कुछ पूरे हुए हैं, कुछ अधूरे हैं और कुछ नए सपने पुराने सपनों की जगह ले चुके हैं।यही किसी जीवंत लोकतंत्र की स्वाभाविक यात्रा है।आने वाले वर्षों में सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा कि वह अपनी उपलब्धियों की सूची कितनी लंबी कर सकती है। महत्वपूर्ण यह होगा कि उन उपलब्धियों का अनुभव देश के सामान्य नागरिक के जीवन में कितना गहरा होता है।भारत की अगली राजनीतिक कहानी शायद इसी अंतर से लिखी जाएगी—सरकार जो हासिल करने का दावा करती है और नागरिक अपने जीवन में जो महसूस करता है, उनके बीच का अंतर कितना कम होता है।
विश्वास वहीं मजबूत होता है जहां शासन की उपलब्धि और नागरिक का अनुभव एक-दूसरे से मिलते हैं।और लोकतंत्र वहीं मजबूत होता है जहां उपलब्धियों के बीच सवाल पूछने की जगह बनी रहती है।आज भारत के सामने यही दोनों दायित्व हैं—उपलब्धियों को आगे बढ़ाना और सवालों को सुनना। क्योंकि अंततः सरकारें चुनाव जीतकर सत्ता में आती हैं, लेकिन इतिहास में उनका मूल्यांकन इस बात से होता है कि उन्होंने जनता के विश्वास के साथ क्या किया।



