क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने करीबी कलेक्टर को अवैध खनन का ‘मैनेजर’ बना दिया है?
मध्यप्रदेश का मालदार जिला कटनी, इन दिनों किसी प्राकृतिक खज़ाने से ज़्यादा सत्ता और संरक्षण के गठजोड़ का अड्डा बनता जा रहा है।
कलेक्टर दिलीप यादव को जब मंदसौर से हटाया गया था, तब कारण था — किसानों की समस्याओं की लगातार उपेक्षा और प्रशासनिक संवेदनहीनता। कलेक्टर दिलीप यादव के मंदसौर कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक संवेदनहीनता की एक हृदयविदारक घटना सामने आई थी।
एक किसान, जो अपनी समस्या लेकर कई बार तहसील और जनसुनवाई में जा चुका था, जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उसने ज़मीन पर लोट लगाकर न्याय की गुहार लगाई थी।
यह घटना न केवल प्रशासन की बेरुखी का प्रतीक बनी, बल्कि किसानों के बीच गहरे अविश्वास और अपमान की भावना को भी जन्म दे गई।
इसके बावजूद, उस कलेक्टर को अब कटनी जैसे संवेदनशील और खनिज संपन्न जिले में पुरस्कृत किया गया, यह सवालों को जन्म देता है।लेकिन आश्चर्य यह है कि बजाय जवाबदेही तय करने के, उन्हें सीधे मध्यप्रदेश के खनिज संपन्न जिले कटनी में भेज दिया गया।
तो सवाल उठता है —
क्या यह दंडात्मक तबादला था या फिर इनाम?
कटनी में खनन की रफ्तार और कनेक्शन
कलेक्टर की पोस्टिंग के बाद से कटनी में खनन गतिविधियों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गई है। ग्रामीणों और स्थानीय सामाजिक संगठनों का दावा है कि:
- कई अवैध खदानें रातोंरात चालू हो गईं।
- खनिज परिवहन में नियमों की अनदेखी खुलेआम हो रही है।
- खनन से जुड़े अधिकांश ठेकेदार और सप्लायर्स उज्जैन से ताल्लुक रखते हैं।
क्या यह केवल संयोग है कि कटनी में उज्जैन के लोग बड़ी संख्या में खनन कारोबार में सक्रिय हो गए हैं? या फिर कोई संगठित संरक्षित व्यवस्था काम कर रही है?
कलेक्टर साहब और उनका “राजशाही” रवैया
जिला प्रशासन में काम कर चुके कुछ वरिष्ठ अफसरों के अनुसार, दिलीप यादव अपने अहंकारी व्यवहार के लिए पहले से ही जाने जाते रहे हैं।
- वे न तो वरिष्ठ अफसरों की सलाह को अहमियत देते हैं,
- और न ही आम जनता की शिकायतों को गंभीरता से सुनते हैं।
- शिकायत करने वालों को डांटकर चुप कराने की आदत अब कटनी में भी दोहराई जा रही है।
किसान: हाशिए पर खड़ा अन्नदाता
खनन की बेलगाम रफ्तार । जहां पहले खेतों में हरियाली थी, अब वहां भारी मशीनों की गरज है।
- ग्रामीण कहते हैं कि अब न ज़मीन बचेगी, न पानी।
- फसलें सूख रही हैं, और प्रशासन से राहत की बजाय घमंड मिल रहा है।
- किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं — उनके पास ना आवाज़ है, ना वकालत।
सवाल जो पूछे जाने चाहिए:
- क्या कटनी को खनन माफियाओं के हवाले कर दिया गया है?
- क्या एक अफसर को किसानों की अनदेखी करने पर ईनाम मिल रहा है?
- क्या मुख्यमंत्री अपने प्रभाव का इस्तेमाल खनन कारोबार में सहूलियत देने के लिए कर रहे हैं?
- और सबसे अहम — जनता की तकलीफ की कीमत पर अफसरशाही का अभिमान कब तक चलेगा?
कटनी का संकट सिर्फ एक जिले की समस्या नहीं है — ये उस व्यवस्था की तस्वीर है जिसमें ज़मीर से ज़्यादा ज़मीन और ज़िम्मेदारी से ज़्यादा जुड़ाव मायने रखने लगा है।
जब अफसर जनता से नहीं, बल्कि सत्ता से डरने लगें — तो नुकसान सिर्फ खदानों तक नहीं रहता, वो लोकतंत्र की नींव तक दरक जाता है।



