नई दिल्ली, 16 जुलाई 2025 — चलो, सच में सोचते हैं—भारत की विदेश नीति अब पूरी-पूरी अर्थव्यवस्था के हिसाब से चल रही है, या फिर उल्टा? ये सवाल पहले जितना बोरिंग नहीं रहा, अब तो हर नुक्कड़ पर बहस छिड़ जाती है। चीन से बढ़ती तनातनी, अमेरिका के साथ टैरिफ पर तकरार, पाकिस्तान और आतंकवाद की झिक-झिक, ऊपर से इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का बेमेल गणित… भाई, पॉलिसी की दिशाएं तो उलझ ही गईं।
चीन से व्यापार: गलवान के बाद भी चालू
गलवान वाली झड़प के बाद सबको यही लगा था कि अब तो भारत चीन से ‘दुश्मनी’ निभाएगा, ट्रेड कम करेगा। पर हकीकत? और उल्टा हो गया। 2020 में भारत ने चीन को $16.6 बिलियन का माल बेचा, इधर से $65.2 बिलियन का माल आया। 2024 तक? एक्सपोर्ट बस थोड़ा सा—$16.7 बिलियन, और इम्पोर्ट $101.7 बिलियन! चीन का अगला टारगेट—$115 बिलियन इंडिया को बेचना, इंडिया का टारगेट? भाई, सिर्फ $18 बिलियन। ये नंबर देख के माथा घूम जाता है।
ये सब बस एक्सेल शीट की बात नहीं है। चीन इस पैसे से अपना मिलिटरी बजट बढ़ाता है—जो बाद में पाकिस्तान वगैरह के हाथों हमें ही चुभता है। चीन का डिफेंस बजट $225 बिलियन, अपना $74 बिलियन। बाकी आप खुद अंदाजा लगा लो।
गलवान, पहलगाम और ‘ऑपरेशन सिंदूर’: बात-बात में जंग के संकेत
डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, ले. जनरल राहुल आर. सिंह ने साफ कहा—अब दो नहीं, तीन-तीन मोर्चों पे लड़ रहे हैं: पाकिस्तान, चीन और आतंकवाद। चीन खुलकर पाकिस्तान को सपोर्ट करता है—हथियार, आइडिया, टेक्नोलॉजी, सबकुछ। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भी यही निकला—पहलगाम अटैक के बाद इंडिया ने जवाब दिया, चीन का नाम भी आया… पर सब “इंडायरेक्ट” तरीके से। डिप्लोमेसी और मिलिट्री तो जैसे आमने-सामने खड़े हैं।
विदेश नीति: बातें बहुत, नतीजे कम
2024 से अब तक मोदी-शी की रूस में मुलाकात हो गई, जयशंकर-रजनाथ की मीटिंग्स हो गईं, पर असल मुद्दों—पाकिस्तान, आतंकवाद, सीमा विवाद—इनपर चीन जरा भी नहीं झुकता दिखा। SCO और ब्रिक्स की बैठकों में इंडिया हमेशा ट्रेड-इन्वेस्टमेंट की बातें करता है, लेकिन क्या गलवान और बॉर्डर की बलि चढ़ा रहे हैं बस डील्स के लिए?
अमेरिका से रिश्ते: कभी खट्टी, कभी मीठी
अमेरिका चाहता है इंडिया के एग्रीकल्चर मार्केट में घुस जाए, इंडिया 40% टैरिफ लगाकर बैठा है—‘भैया, ये हमारी सीमा है’। उधर, अमेरिका अपने यहां सिर्फ 5% ड्यूटी लेता है। डील ठंडी हो गई। फिर इंडिया ने रूस से सस्ता तेल खरीदा, अमेरिका भड़क गया, अब महंगा LPG खरीदना पड़ रहा है। तो पूछिए खुद से—क्या इंडिया के पास कोई लंबी रणनीति है या बस “देखेंगे जो होगा”?
भारत बनाम चीन: आंकड़े खुद बोल रहे हैं
- GDP: भारत — $3.9 ट्रिलियन | चीन — $17.7 ट्रिलियन
- मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट: भारत — $525 बिलियन | चीन — $4.8 ट्रिलियन
- इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च: भारत — 3% | चीन — 8%
- R&D खर्च: भारत — 0.7% | चीन — 2.6%
- एक्सपोर्ट शेयर: भारत — 1.9% | चीन — 14.2%
सीधा-सीधा कहें तो, इंडिया अभी भी चीनी लेवल की मैन्युफैक्चरिंग वाली ‘आत्मनिर्भर’ इकॉनॉमी बनने से कोसों दूर है। टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्री का बेस भी…फिलहाल पतला है।
भारत की दिशा? थोड़ा कन्फ्यूजन है, मानो या न मानो
एक तरफ ‘मेक इन इंडिया’, ‘बॉयकॉट चीन’, और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारे हैं, दूसरी तरफ चीन से इम्पोर्ट बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका से डीलें भी आधी-अधूरी, खेती का डर और ट्रेड बैलेंस की खींचतान बाकी है। और हां, सबसे बड़ी यूथ पावर अपने पास है, पर क्या करवा रहे हैं उनसे? कोई क्लियर पॉलिसी नजर नहीं आती। कहीं 1999-2007 वाला अमेरिका वाला हाल तो नहीं हो जाएगा—जहां चीन के सस्ते माल ने इंडियन इंडस्ट्री को चट कर दिया था?
रास्ता दो ही हैं
या तो इंडिया अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी, MSME, एजुकेशन-हेल्थ, रिसर्च सबको मिलाकर सही में आत्मनिर्भर बने, या फिर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के दबाव में नीतियां यूं ही बहती रहें। जयशंकर, सीतारमण, डोभाल, रजनाथ—ये लोग जितनी भी मीटिंग्स कर लें, असली सवाल यही रहेगा|



