2024 के चुनावों में नजारा ही बदल गया, भाई! बीजेपी उस जादुई 272 का आंकड़ा छू भी नहीं पाई— बस 240 सीटें मिलीं। फिर क्या, सरकार तो बनानी थी, तोड़-मरोड़ कर गठबंधन का जुगाड़ बैठा ही लिया। अब संसद का मानसून सत्र आया है और माहौल कुछ अलग ही टाइप का है। सबको लग रहा है कि असली हलचल संसद में कम, सत्ता के गलियारों में ज़्यादा है। मतलब, जो असली गेम है, वो पर्दे के पीछे ही चल रहा है।
सरकार और पार्टी, दोनों जगह बड़ी-बड़ी उथल-पुथल की तैयारी है, सुनने में तो यही आ रहा है। इस बार सिर्फ नाम नहीं बदलेंगे, भाई, पूरी सोच-समझ, तरीका, टीम, सब का कायाकल्प होने वाला है। 2024 के नतीजों ने बीजेपी को झटका दे दिया, 240 सीटें आईं, मज़बूरी में गठबंधन का सहारा लेना पड़ा। इस साल बीजेपी ने आठ राज्यों में चुनाव लड़ा (लिस्ट लंबी है—आंध्र, अरुणाचल, सिक्किम, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड)। और इसमें से पांच में सरकार बना भी ली—कभी खुद, कभी साथियों के सहारे।
अब असली मसाला सुनो—अंदरूनी खबरें कह रही हैं कि संगठन में भारी फेरबदल होगा, नया खून लाया जाएगा, युवाओं को मौका मिलेगा। कौन बनेगा बीजेपी अध्यक्ष? किसका नाम फाइनल होगा? उपराष्ट्रपति का क्या प्लान है? यूपी में नया प्रदेश अध्यक्ष कौन? सब कुछ बदलने की बात हो रही है, टीम पूरी तरह से रीफ्रेश होने वाली है। दर्जन भर मंत्रियों की छुट्टी की खबर भी है—कुछ की परफॉर्मेंस रिपोर्ट PM के पास पहुंच गई है, अब बस फैसला होना बाकी है। और हां, दिल्ली की गलियों में तो ये भी चर्चा है कि दो मुख्यमंत्री भी साइडलाइन हो सकते हैं!
राजस्थान का तो अलग ही ड्रामा है—वसुंधरा राजे सिंधिया ने मोदी से संसद में मुलाकात की, 20 मिनट तक बात हुई। वैसे तो कैजुअल मीटिंग बोला जा रहा है लेकिन असली मतलब सब समझ रहे हैं। उसी दिन अमित शाह से भी मिलीं। अंदरखाने राजस्थान बीजेपी में घमासान है, भजन लाल शर्मा की कुर्सी खतरे में बताई जा रही है। एक्सपर्ट्स की मानें तो हाईकमान वसुंधरा को फिर से कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकता है। अब गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल ने बोल दिया- “भाई, दोबारा जिम्मेदारी नहीं चाहिए!” – अब ये उनकी अपनी मर्जी है या ऊपर से इशारा मिला है, कौन जाने!
बीजेपी अध्यक्ष का नाम अब तक फाइनल नहीं हुआ। संघ का कहना है, “हमें कोई दिखावा नहीं चाहिए, सच्चा लीडर चाहिए, जो संगठन को आगे ले जाए।” उपराष्ट्रपति की रेस में भी दो गवर्नर—जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक वाले—काफी आगे हैं। कास्ट का गणित भी चलेगा—अगर उपराष्ट्रपति सामान्य वर्ग से होगा तो अध्यक्ष ओबीसी या एससी/एसटी से, या फिर उल्टा। सब जोड़-घटाव चल रहा है।
अब सुनो, धनखड़ वाले एपिसोड के बाद संघ भी पूरा अलर्ट हो गया है। कुछ महीने पहले मोदी और भागवत के बीच थोड़ी ठंडक की खबरें आई थीं, लेकिन अब लगता है दोनों साइड्स ने समझौता कर लिया है—देश और पार्टी दोनों को साथ मिलकर ही संभालना है। नया बीजेपी अध्यक्ष वही होगा जो मोदी का भी करीबी हो और संघ की बात भी समझे। धनखड़ जैसे एक्सपेरिमेंट से सीख मिल गई—संघ की बैकग्राउंड वाला बंदा चाहिए, वर्ना दिक्कत हो जाती है।
मोदी 2029 का रोडमैप बना रहे हैं, सिर्फ चुनाव जीतना ही नहीं, इंडिया को इंटरनेशनल लीडर बनाना है। इसके लिए कड़ाई से टीम चुनेंगे, मंत्री और संगठन दोनों की कड़ी स्क्रूटनी होने वाली है—किसका आउटपुट है, कौन बोझ है, सबकी लिस्ट बनेगी। CCS (कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी) में भी फेरबदल के पूरे आसार हैं।
अब बात सीसीएस की—12-13 मंत्रियों की छुट्टी पक्की मानी जा रही है। नए चेहरे लाने की बात है, जैसे तमिलनाडु के अन्नामलाई, हिमाचल के अनुराग ठाकुर को बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। तेजस्वी सूर्या भी लाइन में हैं। जो लोग 2014 से लगातार मंत्री बने हुए हैं, उनका पत्ता कट सकता है। अमित शाह की भूमिका बरकरार रहेगी, लेकिन फाइनेंस, डिफेंस और एक्सटर्नल अफेयर्स में भी बदलाव हो सकते हैं। ये भी अफवाह है कि शाह फाइनेंस संभाल सकते हैं—अब ये सच है या सिर्फ पॉलिटिकल गॉसिप, कौन जाने। पर भाई, अमित शाह का नाम जब दो बड़े मंत्रालयों से जुड़ता है तो हवा में कुछ तो पक रहा होता है। लोगों को भरोसा है, जो भी काम मिले, शाह संभाल ही लेंगे।
तो कुल मिलाकर, बीजेपी में तूफानी बदलाव आने वाला है—पुराने चेहरे जाएंगे, नया खून आएगा, और मोदी-शाह की जोड़ी फिर नई टीम के साथ अगला बड़ा दांव खेलेगी।



