नई दिल्ली। बिरसा मुंडा जयंती के मौके पर कई राजनीतिक नेताओं द्वारा उन्हें “भगवान” कहकर संबोधित करने पर आपत्ति जताई जा रही है। लोगों ने इस बयानबाज़ी को सनातन परंपरा का सीधा अपमान बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बिरसा मुंडा एक वीर स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी नायक थे, लेकिन किसी मनुष्य को “भगवान” घोषित करना सनातन संस्कृति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
“अगर बिरसा मुंडा भगवान बनाना है, तो गांधी और सरदार पटेल को क्यों नहीं?” – लोगों का सवाल
विरोध करने वालों ने सवाल उठाया कि अगर राजनीति के आधार पर किसी व्यक्तित्व को भगवान की उपाधि दी जा सकती है, तो फिर महात्मा गांधी, सरदार पटेल, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसे अन्य महान नेताओं को भी “भगवान” क्यों नहीं घोषित किया जाता?
लोगों ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है और इससे आदिवासी नायकों की वास्तविक संघर्ष-गाथा को दरकिनार किया जा रहा है।
“नेतृत्व को पूजा नहीं, नीति चाहिए”—समुदाय के युवाओं की टिप्पणी
कई युवा कार्यकर्ताओं ने कहा कि बिरसा मुंडा का सम्मान उनकी नीतियों, संघर्षों, और जल–जंगल–ज़मीन की लड़ाई को आगे बढ़ाकर किया जाना चाहिए, न कि उन्हें देवत्व देकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश से।
वोट के लिए भावनाओं की खुली लूट
जैसे ही चुनाव आते हैं — पोस्टर लगाओ, आरती उतारो, भाषण में “जय बिरसा भगवान” बोल दो… और बस, राजनीति पूरीमगर जमीन?
जंगल?
रोजगार?
शिक्षा?
स्वास्थ्य? इन पर बात कौन करेगा? वोट चाहिए, काम नहीं।
बिरसा मुंडा को नमन, लेकिन राजनीतिकरण पर सवाल
वहीं दूसरी ओर, उनकी जयंती पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए गए और लोगों ने उन्हें श्रद्धा से नमन किया।
हालांकि, यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या महान नायकों को “भगवान” की उपाधि देना उनके संघर्षों के सही सम्मान के बराबर है, या फिर यह सिर्फ एक नया राजनीतिक हथकंडा है। अगर आज वाकई बिरसा मुंडा को नमन करना है, तो उन्हें भगवान बनाना बंद करो और उनके संघर्ष, उनकी हिम्मत, और उनके विचारों को जिंदा रखो। उनके रास्ते पर चलो। उनके जैसे अन्याय के खिलाफ खड़े रहो।
यही उनके प्रति सच्चा सम्मान, यही उनकी जयंती पर वास्तविक श्रद्धांजलि है।



