आजकल बच्चे हर तरफ खूब तरक्की कर रहे हैं। कोई नाचने-गाने में आगे है, कोई खेलकूद में, कोई भाषण प्रतियोगिता जीत रहा है, और कोई आईएएस बनकर देश की सेवा कर रहा है। कोई करोड़ों की कंपनी खड़ी कर रहा है, तो कोई देश के लिए मेडल ला रहा है। ये सब बातें सुनकर गर्व होता है, लेकिन क्या यही असली सफलता है?
हम भूल जाते हैं कि ये सब तो बाहरी कामयाबी है। असली बात है कि उस इंसान के अंदर क्या है – उसका व्यवहार कैसा है, उसका चरित्र कैसा है, और वो मुसीबत में कैसे खड़ा रहता है।
बाहरी हुनर से तालियाँ मिलती हैं, अंदर के गुणों से इज़्ज़त
नाचना, गाना, खेलना, बोलना – ये सब बच्चों को अपने आप आ सकता है या सिखाया जा सकता है। लेकिन किसी का ईमानदार होना, दूसरों की मदद करना, सच्चाई के रास्ते पर चलना, गुस्से पर काबू रखना, ये सब अंदर के गुण हैं – जो एक दिन में नहीं आते, धीरे-धीरे सिखाने पड़ते हैं।
इन्हीं गुणों से बच्चे का असली व्यक्तित्व (पर्सनैलिटी) बनता है, जो जिंदगी भर साथ रहता है।
माता-पिता की असली जिम्मेदारी
आजकल कई माता-पिता इस दौड़ में लगे हैं कि उनका बच्चा सबसे आगे निकले। बच्चे को अंग्रेज़ी सिखा दी, एक्टिंग क्लास में डाल दिया, महंगे स्कूल भेज दिया – ये सब बुरा नहीं है। लेकिन अगर हमने बच्चों को ये नहीं सिखाया कि सच बोलना जरूरी है, किसी की मदद करना अच्छा है, गलती मान लेना ताकत की निशानी है – तो फिर उनका व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है।
सच्चे माता-पिता वही हैं जो बच्चों के भीतर के गुणों को निखारें, न कि सिर्फ बाहर की चमक पर ध्यान दें।
कुछ मिसालें जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं
- कोई आईएएस बन जाए, लेकिन रिश्वत ले तो क्या फायदा?
- कोई खिलाड़ी बन जाए, लेकिन टीम का साथ न निभाए तो उसकी जीत अधूरी है।
- कोई धनकुबेर बन जाए, लेकिन अपने नौकरों से अच्छा व्यवहार न करे – तो क्या वो वाकई बड़ा आदमी है?
इसके उलट, अगर कोई इंसान सादा जिंदगी जीता है, मेहनत करता है, ईमानदार है – तो लोग उसे दिल से याद रखते हैं।
नतीजा क्या निकलता है?
हम सभी चाहते हैं कि हमारे बच्चे आगे बढ़ें, लेकिन सिर्फ आगे बढ़ना काफी नहीं है। अगर उनमें संस्कार नहीं होंगे, सच्चाई नहीं होगी, इंसानियत नहीं होगी, तो उनकी सफलता खोखली हो जाएगी।
बच्चों को बाहर चमकने का मौका दें – मंच पर बोलें, खेलें, जीतें – लेकिन साथ ही उन्हें ये भी सिखाएं कि कैसे अच्छा इंसान बना जाता है।
क्योंकि कामयाबी एक दिन की होती है, लेकिन अच्छा चरित्र उम्र भर लोगों के दिलों में रहता है।
बच्चे वो नहीं बनते जो हम उन्हें सिखाते हैं, बच्चे वो बनते हैं जो वो हमें करते हुए देखते हैं।
इसलिए माता-पिता और शिक्षक खुद भी वैसी बातें अपनाएं, जो वो बच्चों में देखना चाहते हैं।




