कटनी, मध्यप्रदेश | विशेष रिपोर्ट
“पहले ज़मीन ली, फिर झूठे कागज़ बनाए, फिर कोर्ट में घसीटा… और अब कह रहे हैं — हाईकोर्ट चले जाओ!”
ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये हैं कटनी जिले के किसान श्री विनोद कुमार की टूटती उम्मीद की आवाज़, जो बीते 20 साल से एक ही सवाल पूछ रहे हैं — क्या इस देश में किसान की कोई इज़्ज़त नहीं बची?
कागज़ कुछ और कहते हैं, ज़मीन पर कुछ और हुआ
करीब 20 साल पहले, विनोद कुमार की ज़मीन सरकार ने सड़क परियोजना के लिए अधिग्रहित की। लेकिन जिसने ज़मीन अधिग्रहित की, वहाँ सड़क बनाई ही नहीं गई।
निर्माण एजेंसी ने अपने हिसाब से ‘अलाइनमेंट’ बदल दिया और सीधे विनोद की निजी भूमि पर सड़क बना दी — बिना पूछे, बिना बताए, बिना नियम का पालन किए।
यह कोई भूल नहीं थी — यह खुला अन्याय था।
मुआवज़ा भी दिखावा — जहाँ सड़क नहीं बनी, वहीं का भुगतान
सबसे हैरानी की बात ये है कि सरकारी दस्तावेजों में मुआवज़ा उस ज़मीन का दिखाया गया जहाँ सड़क कभी बनी ही नहीं।
जहाँ असल में सड़क बनाई गई — उस ज़मीन का नाम ही नहीं आया।
अब सोचिए — किसान की असली ज़मीन गई, और सरकार ने मुआवज़ा कागज़ों में किसी और ज़मीन का दिखा दिया।
क्या ये धोखा नहीं है?
क्या सरकार बताएगी कि जब रास्ता ही बदल गया था, तो ठेकेदार को पेमेंट उसी नक्शे पर कैसे कर दिया गया?
15 साल तक कोर्ट में माथा रगड़ा, तब जाकर राहत मिली… थोड़ी सी
विनोद कुमार ने हिम्मत नहीं हारी। 15 साल तक तहसील, राजस्व न्यायालय और सिविल कोर्ट में लड़ाई लड़ी।
आख़िरकार, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार ज़मीन खाली करे।
एक पल को विनोद को लगा कि शायद अब न्याय मिलेगा।
लेकिन सरकार ने उस आदेश पर अमल करने की जगह हाईकोर्ट में अपील कर दी — और ‘स्टे’ ले आई।
अब किसान को 100 किलोमीटर दूर जबलपुर हाईकोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
हाईकोर्ट का ‘स्टे’ था — फिर भी बचे खेत पर 4 लेन सड़क बना दी गई!
जिस ज़मीन पर हाईकोर्ट ने रोक लगा रखी थी (खसरा नंबर 1314), वहां भी सरकार ने निर्माण करवा दिया।
किसान ने आपत्ति दर्ज की, अधिकारियों को बताया — लेकिन किसी ने नहीं सुना।
SDM ने कहा कि NHAI महाधिवक्ता से राय ले।
पर महाधिवक्ता की राय की जगह NHAI ने अपने निजी वकील की राय भेज दी, और SDM ने उसे ही मान लिया।
क्या न्याय की प्रक्रिया इतनी हल्की हो गई है?
क्या अफसर अब निजी सलाह से चलने लगे हैं?
मुआवज़ा भी नियम तोड़कर तय कर दिया गया
जब मजबूरी में बची ज़मीन का अधिग्रहण मान लिया गया, तो सोचा गया कि अब शायद सही मुआवज़ा मिलेगा।
लेकिन यहां भी मुआवज़े की गणना गलत ढंग से कर दी गई — नियमों को नजरअंदाज़ कर के।
अब किसान ने कलेक्टर के पास अपील की है, पर बीते 3 सालों से सिर्फ तारीखें मिल रही हैं — सुनवाई नहीं।
सवाल सिर्फ एक किसान का नहीं — ये पूरे देश के किसानों की हालत है
- ज़मीन गई
- मुआवज़ा नहीं मिला
- कोर्ट से आदेश मिला, तो सरकार हाईकोर्ट भाग गई
- हाईकोर्ट के स्टे को भी नजरअंदाज़ कर सड़क बना दी
- मुआवज़ा फिर से नियमों के खिलाफ
- और अब न्याय के नाम पर बस “तारीख़ पे तारीख़”
सरकार से सवाल जो जवाब मांगते हैं:
- जब अलाइनमेंट बदला, तो क्या प्रक्रिया अपनाई गई?
- गलत नक्शे पर ठेकेदार को भुगतान क्यों किया गया?
- हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद सड़क कैसे बनी?
- महाधिवक्ता की राय क्यों नहीं मानी गई?
- कलेक्टर तीन साल से निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे?
किसान पूछता है: क्या यही है कृषि प्रधान देश का सच?
विनोद कुमार की कहानी कोई अपवाद नहीं — ऐसे हजारों किसान हैं जो अपनी ज़मीन, समय, पैसा और आत्मसम्मान खो चुके हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि सिस्टम सुनना ही नहीं चाहता।
कटनी संवाददाता | अगस्त 2025
यह रिपोर्ट किसान विनोद कुमार के दिए तथ्यों और दस्तावेज़ों पर आधारित है



