नई दिल्ली, 12 जुलाई। भारत और अफगानिस्तान के तालिबान प्रशासन के बीच व्यावहारिक सहयोग का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में नई दिल्ली में दोनों पक्षों के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग को लेकर महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें कृषि अनुसंधान, उन्नत बीज, खाद्य सुरक्षा, सिंचाई तकनीक, पशुपालन और वैज्ञानिक आदान-प्रदान जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक की विशेष बात यह रही कि भारत ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, फिर भी दोनों पक्ष कृषि जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित करने पर सहमत हुए। इसी उद्देश्य से एक संयुक्त कार्यदल (Joint Working Group) गठित करने का निर्णय लिया गया, जो भविष्य की परियोजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और तकनीकी सहयोग की रूपरेखा तैयार करेगा।
भारतीय प्रतिनिधियों ने अफगानिस्तान में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज, जलवायु-अनुकूल फसल प्रजातियों, कृषि अनुसंधान और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग का प्रस्ताव रखा। दोनों देशों के कृषि वैज्ञानिकों और संस्थानों के बीच अनुभव साझा करने तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने पर भी सकारात्मक चर्चा हुई।
भारत और अफगानिस्तान के बीच कृषि सहयोग कोई नया विषय नहीं है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इस स्तर की औपचारिक बातचीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने अपना दूतावास अस्थायी रूप से बंद कर दिया था। बाद के वर्षों में मानवीय सहायता, व्यापार, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर सीमित संपर्क फिर शुरू हुआ। अब कृषि क्षेत्र में बढ़ता सहयोग इस संवाद को एक नया आयाम देता दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। ऐसे में बीज, अनुसंधान और कृषि तकनीक के क्षेत्र में सहयोग वहां की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकता है। वहीं भारत के लिए यह मध्य एशिया क्षेत्र में अपने विकास सहयोग और जन-केंद्रित कूटनीति को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि तालिबान प्रशासन को औपचारिक मान्यता देने की उसकी नीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। दोनों पक्षों के बीच जारी संवाद को मानवीय, विकासात्मक और व्यावहारिक सहयोग तक सीमित बताया जा रहा है। ऐसे में यह बैठक केवल कृषि सहयोग तक सीमित नहीं, बल्कि बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच भारत की संतुलित कूटनीतिक नीति का भी संकेत मानी जा रही है.



