सहकारिता मतलब कि आपस में मिलकर, खुद के पैरों पर खड़े होकर जीना। सीएम मोहन यादव ने भोपाल में ‘सहकारी युवा संवाद’ के दौरान यही बात दोहराई—और सीधा-सीधा बोला कि पीएम मोदी ने देश को नया फंडा दिया है: लोकतंत्र और सहकारिता, दोनों साथ लेकर चलो। अब, ये कोई किताबों वाली थ्योरी नहीं है, बल्कि असली ज़िंदगी की बात है—जिसे मध्यप्रदेश भी, वैसे ही, जमकर अपनाने में लगा है।
डॉ. यादव ने तो बोल ही दिया—सहकारिता के मायने ही हैं कि एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ो। पीएम मोदी का ये मंत्र अब ज़मीन पर उतर रहा है। हर दिन कुछ नया हो रहा है, और आंकड़े भी बदलते जा रहे हैं। बच्चों से लेकर बड़े तक, सबको असली एक्सपीरियंस चाहिए, न कि सिर्फ किताबों की बातें। वैसे, सीएम साहब खुद 5 जुलाई को भोपाल के समन्वय भवन में यूथ से मुखातिब थे, और हर किसी से खुलकर बातचीत भी की।
अब पढ़ाई-लिखाई की बात करें, तो सीएम यादव का कहना था कि कॉलेज की पढ़ाई तो बस किताबों तक सिमटी रहती है। असली दुनिया तो बाहर है, जहां हमारा प्रदेश—जो वैसे भी नदियों के मायके के नाम से जाना जाता है—प्राकृतिक संसाधनों से भरा पड़ा है। वक्त के साथ इंडस्ट्रियलाइजेशन ज़रूरी है, तभी तो इंडस्ट्रीज़ को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका फायदा? प्रोडक्ट्स की वैल्यू बढ़ी, बेरोजगार युवाओं को नई दिशा मिली, और रोज़गार के मौके भी।
पीएम मोदी का सपना? सीधा है—हर इंडिविजुअल अपने सपनों को उड़ान दे सके। सीएम यादव भी यही चाहते हैं कि हर किसी के लिए तरक्की के रास्ते खुले रहें। 2047 तक इंडिया नंबर वन बनेगा, बस इसी के लिए सब जुटे हैं। वैसे, सहकारिता की सबसे बड़ी मिसाल तो हमारे धार्मिक फंक्शन्स हैं, जो बिना सबकी भलाई के अधूरे रहते हैं। तो भाई, मिल-जुलकर आगे बढ़ो, यही असली मंत्र है।
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